दोस्तो आज मैं ऐसी post लेकर आया हूँ जिसे पढ़कर आपको अहसास होगा कि जीवन
जीने के लिए पैसा ही सब कुछ नही होता | रिश्तो को जब पैसो के तराजू मे
तौलगें तो दुनियॉ  की सारी सम्पदा कम पड़ जाऐगी | रिश्तो को आप पैसों के बल
से झुका सकते हो मगर पा नही सकते…….रिश्तों को प्यार से पाया जा सकता है और करूणा से
निभाया जा सकता है | जब रिश्तों को अहंकार में डूबकर निभाया जाता है तो क्या होता है……?

आइएं समझते है इन पक्तियो के माध्यम से धीरे – धीरे दिलो में बढ़ती दरार की वजह :-

> जब बात अपनी , अपनों से छिपाने लगा |
> तब नियत मे खोट साफ नज़र आने लगा |
>
> उठते है हाथ जो प्रहार को ,
> थे कभी समर्पित छूने चरण को |
> उठता है जो शीश अभिमानित होकर,
> कभी झुकता था नम्रता को नैनो मे डुबोकर |
> भाषा में थी शालिनता मृदुलता और सभ्यता,
> आज क्यों है कटुता कठोरता और असभ्यता |
>
> हम जी रहे है तो किसके लिए , इस धरती पर ऐसे महान लोगो ने जन्म लिया
जो दुसरो के लिए जीये और अपना नाम अमर करने के बावजूद वो पुन: यह साबित नहीं
कर पाये कि लो मैं फिर से एक जिन्दगी जीने के लिए आप लोगो के बीच हूँ , तो
फिर हमने तो ऐसा न कुछ किया है और न कुछ कर रहे है तो फिर किस भ्रम में रह
रहे है इस जन्म मे न जाने कौन-सी सॉस कौन-सा पल आखिरी हो यह कोई नहीं जानता
मगर मृत्यु के पश्चात मैं तो सिर्फ इतना जानता हूँ कि जितनी आश ऊपर वाले से
लगा रखी है जीते जी पूरी न हो…. मगर नीचे वाले जो पास है वो जरूर तुम्हारी
बातो को लेकर रोएगें और तुम दूर आकाश में यह सब नजारा देख रहे होगें और तब
तुम्हारी रूह रो सकती है मगर आँसू नहीं बहा सकती क्योकि तब तुम्हरे पास यह
शरीर नहीं होगा |
> क्योकि यह शरीर तब नष्ट किया जा रहा होगा | तब तुम फिर से पुनरजीवन की
इच्छा करोगे मगर तब यह सम्भव नहीं होगा , तुमसे मिलने वो भी आयेगें जो काफी
समय से तुम्हारे बारे अहित की कामना अपने मन मे दबाये रखते थे मगर मुहँ पर
आकर कभी कह नहीं पाये ,कह तो आज भी नहीं पायेगें मगर अपने ह्रदय मे जरूर
शीतलता का अहसास करेगें |
> लेकिन अपने तो अपने होते है आपस की कड़वाहट से आँखों का पानी भले मर गया हो मगर ह्रदय जरूर फूट- फूटकर रोएंगा |
> एक कसक-सी सीने में उठेगी , पॉव दौड़ने को भागेगें, मन जोर से चीखने को
बोलेगा और आत्मा से आवाज आयेगी क्यो चला गया छोड़कर ……..? बस अब अतीत की
यादो मे ढुडना उस चेहरे को परन्तु हकीकत की आवाज बनकर सामने कभी नही आयेगा
|
> कभी बहकने मे मुख से जो अपशब्द निकले वो ह्रदय में छप गये मगर आँखो में
अप्रकाशित जन्म से हर रोज एक-एक सहयोग का पन्ना लिखता और मिटता रहा परन्तु
कभी किताब का रूप न ले सका , क्या प्रमाण की अनुपस्थिति मे अपनत्व का
साक्ष्य सिद्ध नहीं होगा ?
> इसलिए यह सब भुलादो कि मेरा कितना नुकसान है और उसका कितना फायदा ,
भला तब नही होगा जब तक वह अपने तक सीमित है और कोई भी बड़ा आदमी इस बात का
सबूत है कि उसने अपने फायदे से पहले औरों के भले के बारे में पहले सोचा हैं |
> ”इसलिए खुशियॉ आएंगी तो भला सब का होगा |”

दोस्तों, आपको हमारी ये पाँस्ट “रिसते हुए रिश्तो “की कैसी लगी हमें comment करकें जरूर
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