राजनीति , कूटनीति और शाशन व्यवस्था मे दक्ष महापंडित विद्वान आचार्य
चाणक्य एक ऐसे क्रान्तिदृष्टा विचारक थे , जो इतिहास को एक नया मोड़ देने
की क्षमता रखते थे | वह अत्यन्त दूरदर्शी और कुशाग्र बुद्धि के स्वामी थे |
     आचार्य चाणक्य को ‘ कौटिल्य’ और ‘ विष्णुगुप्त’ के नामों से भी जाना
जाता है | चणक पुत्र होने के कारण उन्हें चाणक्य नाम मिला था और कुटिल
राजनितिज्ञ होने के कारण उन्हे ‘ कौटिल्य ‘ के नाम से सम्बोधित किया गया |
उनके पिता के द्वारा दिया गया वास्तविक नाम ‘विष्णुगुप्त’ था | कुछ
विद्धानों का मत है कि कुटिल गोत्र के वशंज और अर्थशास्त्र ग्रन्थ के
प्रणेता होने के कारण चाणक्य को ‘ कौटिल्य ‘ कहा जाता है |

      आचार्य चाणक्य का सम्पूर्ण जीवन जन- कल्याण की भावना से ओत – प्रोत
था | वे महान आर्दशवादी , सामाजिक तथा राजनीतिक मर्यादाओं के प्रतिष्ठापक
थे | विद्वानों का तो यहॉ तक मानना है कि जिन्होने कौटिल्य के अर्थशास्र का
अध्यन नहीं किया , वे राजतन्त्र का सफल सचांलन ही नहीं कर सकते |
    आचार्य चाणक्य के जीवन की प्रारम्भिक घटना से उनके चरित्र का बहुत
सुन्दर खुलासा होता है | एक बार वे अपने शिष्यों के साथ तक्षशिला से मगध आ
रहे थे मगध का राजा महानन्द उनसे द्वेष रखता था | वह एक बार भरी सभा में
चाणक्य का अपमान कर चुका था | तभी से उन्होने सकंल्प कर लिया था कि वे मगध
के सम्राट महानन्द को पदच्चुत करके ही  अपनी शिखा में गांठ बांधेंगे | इसके
लिए वे अपने सर्वाधिक प्रिय शिष्य चन्द्रगुप्त को तैयार कर रहे थे |
     मगध पहुंचने के लिए वे सीधे मार्ग से न जाकर एक अन्य उबड़ – खाबड़
मार्ग से अपना सफर तय कर रहे थे | उस मार्ग में काटें बहुत थे | तभी उनके
नगें पैर में काटा चुभ गया | वे क्रोध से भर उठे |  तत्काल उन्होंने अपने
शिष्यों से कहॉ – ” उखाड़ फेंको इन नागफनों को | एक भी शेष नहीं रहना चाहिए
|’
      उन्होंने तब उन कांटों को ही नहीं उखाड़ा , उन कांटों के वृक्षों की
जड़ों में मट्ठा लाकर डाल दिया , ताकि वे दुबारा न उग सकें | इस प्रकार वे
अपने शत्रु  का समूल नाश करनें में ही विश्वास करते थें , अपनें द्वारा नया
मार्ग बनाने में विश्वास करतें थे |
      आचार्य चाणक्य भ्रमण पर निकले हुए थे ,साथ में उनके शिष्य भी थे |
रात्री का समय था दोनों कदमदर कदम बढ़ाये जा रहे थे कि तभी अचानक चाणक्य
रूख गये | उनके शिष्य ने अचानक से रूकने कारण पूँछा |
चाणक्य बोले – ” मेरा शिष्य किसी परेशानी में है और मुझे तत्काल वापस उसके पास पहुँचना होगा |”
यह सब सुनकर शिष्य ने विस्मय सुर मे कहॉ – ” आपको यह सब कैसे पता चला कि चन्द्रगुप्त किसी समस्या में हैं ?
आचार्य चाणक्य बोले – ” जब किसी को आप अपने ह्रदय मे बसा लेते है तो यह
वातावरण एक दुसरे की भावनाओं को सचारित करने लगता है , एक हल्की सी आहट
होती है उस इसारे को महसूस करना पड़ता है | इस समय चन्द्रगुप्त को चाणक्य
की आवश्यकता है | और यह कहना गलत नही होगा कि चन्द्रगुप्त के बिना चाणक्य
अधूरा है और चाणक्य के बिना चन्द्रगुप्त अधूरा हैं |
   आचार्य चाणक्य के जीवन का उद्देश्य था – जन कल्याण | इसी उद्देश्य के
निमित्त उन्होंने अपने ग्रन्थों की संरचना की थी | उनकी राजनीति सदाचार और
धर्म से अलग नहीं थी | आज के सन्दर्भ में चाणक्य की नीतियां उतनी ही कारगर
हैं , जितनी कि चाणक्य के काल में थीं | मनुष्य आज भी वही है, जो तब था |
आज उसे जिस तरह की परिस्थितियों के मध्य से गुजरना पड़ रहा है , उस समय भी
कमोबेश कुछ ऐसी ही परिस्थितियों से उन्हें दो – चार होना पड़ा होगा |
     दोस्तों,  यह लेख मैनें महंत ओमनाथ शर्मा जी द्वारा लिखित चाणक्य नीति से लिया है | उम्मीद करता हूँ आपको पसदं आया होगा |

आपको हमारी ये post कैसी लगी हमें जरूर बताइयें  अगर आपके पास भी कोई ऐसा
पॉस्ट या आर्टिकल है तो हमें अपने नाम और फोटो के साथ मेल करियें अच्छा
लगने पर हम प्रकाशित करेगें | हमारा मेल है :- merajazbaamail@gmail.com यह पॉस्ट आपको पसदं आई हो तो अपने दोस्तों को share करे, कमेंट करे और हॉ like करे  |

Leave a comment

Your email address will not be published.