दोस्तों , आपने अधिकतर लोगों को कहते सुना होगा , ” तू जानता नहीं, मैं कौन हूँ ?”
आपने भी इस वाक्य का प्रयोग कई बार किया होगा. अगर बात मैं अपनी करू तो मैनें भी इस वाक्य का इस्तेमाल बचपन में झगड़े के दौरान किया हैं.
हम सामने वाले को वह बताने की कोशिश करतें हैं जिससे हम खुद अजांन होते हैं.
क्या आपके मन में ऐसे प्रश्न आये हैं ?
क्या आपके साथ भी ऐसा होता हैं ?
क्या आप खुद को जानते हैं ? 
            
जो जानते हैं, क्या वह तुम्हारा Passion  हैं ?
मैं आपको एक कहानी सुनाता हूँ. एक बार एक गाँव में साधू आयें हुए थे. वह गाँव के बाहर ही ठहरे हुए थे.  उनके ज्ञान की चर्चा पूरे गाँव भर में हो रही थी.
गाँव के लोगों के मन में साधू से शिक्षा लेने की इच्छा हुई । सभी ने मिलकर तय किया कि एक साथ जाने से साधू मना कर दें. इसलिए एक-एक करके जाना उचित रहेगा.
उसी योजना के अनुसार एक व्यक्ति ने बाबा की कुटियाँ पर जाकर दरवाजा खटखटाया , ” खटखट 💤
साधू – कौन हैं …??
मैं मोहनआपसे शिक्षा प्राप्त करना चाहता हूँ.
तुम्हे सब कुछ आता हैं. तुम्हें सीखने की आवश्यकता नहीं हैं. अब तुम जा सकते हो – साधू ने कहाँ.”
मोहन ने गाँव में आकर बताया , ” वह साधू बहुत घमण्ड़ी हैं. उसने मुझे सब कुछ जानते हो, कहँकर मना कर दिया.
गाँव वालों ने मिलकर निर्णय किया इस बार हम गाँव के मुखियाँ को भेजतें हैं. वह जरूर साधू से आशीर्वाद लेकर आयेगें.
गाँव वालों के बतायें अनुसार मुखियाँ भी साधू की कुटियाँ पर पहुँचतें ही दरवाजे को खटखटाया……
साधू ने अदंर से उसी तरह आवाज लगाई – कौन हैं ?
मैं गाँव का मुखियाँ ‘गंगाराम‘ हूँ.
साधू – तुम्हें क्या काम हैं ?
मुखियाँ – मैं आपसे शिक्षा ग्रहण करना चाहता हूँ.
साधू – तुम्हें शिक्षा की कोई आवश्यकता नहीं हैं क्योकि तुम्हें सब कुछ आता हैं . अब तुम जा सकते हों.
मुखियाँ के दिमाक में कई प्रश्न थे मगर अब उसे विश्वास हो गया कि यह साधू ढ़ोगी हैं, घमण्ड़ी हैं , या फिर पागल हैं.
उसने सारी बात गाँव वालों को बताई और बोला,” इस साधू को अपने गाँव की सीमा में नहीं रहने देगे.”
उसी गाँव में ‘जयेश’ नाम का धैर्यवान तथा विचारशील व्यक्ति रहता था.  वह सभी की बाते बड़े गौर  से सुन रहा था. जब सभी ने बाबा को गाँव की सीमा से बाहर निकालने का निर्णय ले लिया तो जयेश ने सबको रोकते हुए समझाया , ” इस बार आप सभी लोग मुझे मौका दें , मुझे खुद पर पूरा विश्वास हैं. अगर मैं खाली हाथ लौटा तो आप उस साधू को गाँव की सीमा से बाहर कर देना.
सभी लोग उसका विश्वास देखकर उसकी बात पर राजी हो गयें .
यह बात मुखियाँ को ठीक नहीं लगी. मुखियाँ ने एक शर्त रख दी और वह शर्त यह थी कि साधू ने इसको शिक्षा देने से मना कर दिया या फिर कोई बहाना लगाकर टाल दिया तो जयेश को भी गाँव छोड़कर जाना होगा.
यह सुनकर सभी लोग चौक गयें मगर इससे पहले कोई कुछ कहता जयेश ने मुखियाँ की शर्त को स्वीकार कर लिया.
अगले दिन सुबह ही जयेश बाबा की कुटियाँ पर पहुँच गया. बाबा ध्यान मुद्रा में बैठे हुए थे. जयेश वहीं पर बैठकर बाबा की आँख खुलने का इतंजार करने लगा.
जब बाबा की आँख खुली तो अपने सामने जयेश को बैठा देख साधू बोलें, ” तुम कौन हो और यहाँ क्यों बैठे हो ?”
जयेश ने दोनों हाथ जोड़ते हुए कहाँ, ” हें महात्मन् ! मुझे नहीं मालूम मैं कौन हूँ ?
मैं आपके पास इसी का जवाब जानने आया हूँ.
साधू तुरन्त समझ गयें और बोले, ” तुम्हें ज्ञान की जरूरत हैं. और उन्होनें जयेश को अपना शिष्य बना लिया.
जब जयेश को साधू ने अपना शिष्य बना लिया तो जयेश ने साधू से पूँछा, ” आपने मुझे अपना शिष्य बना लिया जबकि मैनें कहाँ भी नहीं और जब गाँव के मुखियाँ और मोहन ने आपसे शिक्षा प्राप्त करने के लिए आग्रह किया तो आपने उनको मना कर दिया. ऐसा क्यों …..??
साधू बोले – जब मैने उनसे उनके बारें में पूँछा तो उन्होनें बता दिया. और जब बता दिया तो मैं उन्हें भला क्या बता सकता था ?
लेकिन तुमने मेरे प्रश्न को ही अपना प्रश्न बना लिया. तो तुम ही बताओं, मैं तुम्हें बिना शिष्य बनाये कैसे बता सकता था कि तुम कौन हो ?
बीज खाली भूमि में ही बोया जा सकता हैं.”
इसी प्रकार हम न जानें कितना फिजूल का ज्ञान लियें फिर रहें हैं. सभी को अपने ज्ञान की अधिकता का अभिमान तो हैं लेकिन हकीकत में आप कौन हैं ? इसकी महत्ता का अदांजा नहीं ….आप अपने आपको सहीं चीजों के लिए हमेशा खाली रखीयें.
आप अपने Passion को पहचानियें.
आप हर रोज खुद से निम्न प्रश्न कीजिए.
* मैं जो कर रहा हूँ , क्या वह मेरी पसंद का काम हैं ? 
जब आप हर रोज आइने के सामने खुद से पूँछेगें कि क्या यह वहीं काम हैं , जिसकी मैनें शुरू से इच्छा की थी ?
या फिर मैं वह काम कर रहा हूँ जो हालात मुझ से करा रहें हैं. अब जब मैं यह जान गया हूँ तो इससे बाहर निकलने के रास्तें क्या हो सकते हैं ? 
* मैं जो कर रहा हूँ, क्या वह काम मुझे थकाता हैं ?
आप थोड़ा काम करने बाद ही थक जाते हैं तो यह जरूरी नहीं की आप में कमजोरी हैं. हो सकता हैं कि आपका काम  आपको थका रहा हों. काम भले ही आपने थोड़ा किया हो मगर जब काम मन का नहीं हो तो मानसिक तौर पर तनाव हो जाता हैं.
ऐसी स्थिति में आप जल्दी थक जायेगें और इसकी एकमात्र वजह आपका मन आपके काम पर न होना हैं.
* मैं जो कर रहा हूँ, क्या वह काम मु्फ्त में भी कर     सकता हूँ ?
आपको काम का एक रूपया भी न दिया जायें. तो आप काम को हाथ लगायेगें ? अधिकतर लोगों का जवाब नहीं होगा. यही वजय हमें किसी भी काम में सफल नहीं होने देती. जब भी हमें थोड़ी परेशानी आती हैं. हम काम छोड़ देते हैं या फिर दुसरा पकड़ लेते हैं. जबकि यहीं समय सबक लेकर उसी क्षेत्र में आगे बढ़ने का होता हैं.
जब आपका काम औरों को फायदा पहुँचाने का हो तो वो काम एक न एक दिन आपकी मेहनत का फल अवश्य देंगा.
इस बात को Proof करने के लिए मैं दो उदाहरण देता हूँ .
* बाबा रामदेव जी.
* Jio Founder मुकेश अम्बानी.
Ex – आपकी  ट्रेन आपको मंजिल तक तभी पहुँचा सकती हैं जब आप उसमें धैर्य पूर्वक बैठे रहेगें अगर आप ट्रेन को बदल देगें तो आप अपनी मंजिल तक कभी नहीं पहुँचेगे.
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